हर इंसान के दिल में एक चाहत होती है – किसी से जुड़ने की। हमें अपना लगने की ज़रूरत होती है और यह हमारी ज़िंदगी का एक अहम् हिस्सा है। जब हमें कहीं अपनापन महसूस नहीं होता है और लगता है कि हमारी यहाँ कोई जगह नहीं है तब हमें बहुत दर्द होता है।
कनाडा की लेखिका टोको-पा टर्नर कहती हैं – परायापन का मतलब यह महसूस करना है कि आपकी ज़रूरत किसी को नहीं है। कोई आपको बुलाने नहीं आता। और यह आपके सबसे बड़े डर को सच कर देता है। धीरे-धीरे आप और अकेले हो जाते हैं… कभी-कभी मौत तक के ख़याल आने लगते हैं।
कभी परायापन का दर्द थोड़े समय के लिए होता है। कभी यह सालों तक हमारे साथ चलता है। ऐसा लगता है जैसे हम किसी काम के नहीं हैं। कभी यह अनुभव सच पर आधारित होता है, और कभी यह सिर्फ़ हमारी सोच होती है। ऐसे समय में हम उन्हीं लोगों को दूर कर देते हैं, जो हमें सच में चाहते हैं। जब यह दर्द बहुत बढ़ जाता है, तो इंसान खुद से नफ़रत करने लगता है और आत्महत्या करने तक की सोचने लगता है । "आत्महत्या को टर्नर 'स्वयं को अस्वीकार करने का सबसे चरम रूप' कहती हैं।"
तो हम क्या करें? टर्नर कहती हैं – अकेलेपन से मत भागो । उसे अपनाओ। उसके साथ दोस्ती करो। जब हम ऐसा करते हैं, तो वो अंदर की आवाज़ जो कहती है – "तुम काफ़ी नहीं हो, तुम प्यार के लायक नहीं हो" – वो धीरे-धीरे चुप हो जाती है। असली अपनेपन की भावना तब आती है, जब हम अकेलेपन को प्यार से देखते हैं। फिर डर कम होने लगता है और हम मज़बूत बनते जाते हैं। फिर हम दूसरों की तरफ इस लिए दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाते की हमें अकेलेपन से डर लगता है बल्कि इस लिए कि हम अपनेपन में निहित हैं. धीरे धीरे हममें दूसरों से जोड़ने की और उनके अपनेपन के बुलावे को स्वीकार करने की ताकत आ जाती है।
Writer: Fr. John Baptist OFM Cap
Translator: Sr. Ekta FSLG
Notes
Turner, T. (2017). Belonging: Remembering ourselves home (pp. 22-25). Her Own Room Press.