Monday, August 11, 2025

परायापन के डर को शांत करना


हर इंसान के दिल में एक चाहत होती है – किसी से जुड़ने की। हमें अपना लगने की ज़रूरत होती है और यह हमारी ज़िंदगी का एक अहम् हिस्सा है। जब हमें कहीं अपनापन महसूस नहीं होता है और लगता है कि हमारी यहाँ कोई जगह नहीं है तब हमें बहुत दर्द होता है।

कनाडा की लेखिका टोको-पा टर्नर कहती हैं – परायापन का मतलब यह महसूस करना है कि आपकी ज़रूरत किसी को नहीं है। कोई आपको बुलाने नहीं आता। और यह आपके सबसे बड़े डर को सच कर देता है। धीरे-धीरे आप और अकेले हो जाते हैं… कभी-कभी मौत तक के ख़याल आने लगते हैं। 

कभी परायापन का दर्द थोड़े समय के लिए होता है। कभी यह सालों तक हमारे साथ चलता है। ऐसा लगता है जैसे हम किसी काम के नहीं हैं। कभी यह अनुभव सच पर आधारित होता है, और कभी यह सिर्फ़ हमारी सोच होती है। ऐसे समय में हम उन्हीं लोगों को दूर कर देते हैं, जो हमें सच में चाहते हैं। जब यह दर्द बहुत बढ़ जाता है, तो इंसान खुद से नफ़रत करने लगता है और आत्महत्या करने तक की सोचने लगता है । "आत्महत्या को टर्नर 'स्वयं को अस्वीकार करने का सबसे चरम रूप' कहती हैं।"

तो हम क्या करें? टर्नर कहती हैं – अकेलेपन से मत भागो । उसे अपनाओ। उसके साथ दोस्ती करो। जब हम ऐसा करते हैं, तो वो अंदर की आवाज़ जो कहती है – "तुम काफ़ी नहीं हो, तुम प्यार के लायक नहीं हो" – वो धीरे-धीरे चुप हो जाती है। असली अपनेपन की भावना तब आती है, जब हम अकेलेपन को प्यार से देखते हैं। फिर डर कम होने लगता है और हम मज़बूत बनते जाते हैं। फिर हम दूसरों की तरफ इस लिए दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाते की हमें अकेलेपन से डर लगता है बल्कि इस लिए कि हम अपनेपन में निहित हैं. धीरे धीरे हममें दूसरों से जोड़ने की और उनके अपनेपन के बुलावे को स्वीकार करने की ताकत आ जाती है।

Writer: Fr. John Baptist OFM Cap

Translator: Sr. Ekta FSLG

 

Notes 

Turner, T. (2017). Belonging: Remembering ourselves home (pp. 22-25). Her Own Room Press. 

 

Thursday, August 7, 2025

तुम प्रेम के पात्र हो


नमस्कार मित्रों,

आज हम एक बहुत सुंदर और गहरी सच्चाई पर मनन करेंगे।
जब परमेश्वर हमसे बिना शर्त प्यार करता है — चाहे हम अच्छे हों या बुरे —
तो फिर हमें अच्छा बनने की क्या ज़रूरत है? यह सवाल बहुत लोगों के मन में आता है।

रोनाल्ड रोलहाइज़र इसका उत्तर बहुत सुंदर तरीके से देते हैं। वे कहते हैं:

"अगर परमेश्वर हमें तब भी प्यार करता है जब हम गलतियाँ करते हैं, और तब भी जब हम सही चलते हैं, तो फिर हम अच्छे क्यों बनें? असली प्रेम कोई इनाम नहीं है। प्रेम के कारण ही हम अच्छे बनते हैं। हमें इसलिए प्यार नहीं किया जाता क्योंकि हम अच्छे हैं, बल्कि जब हमें सच्चा प्रेम मिलता है,
तो हम अच्छे बनने लगते हैं।" 

यह सच्चाई हमारे सोचने का तरीका बदल देती है। अगर प्रेम कोई सौदा है — कि हम अच्छे होंगे तभी हमें प्रेम मिलेगा तो वह प्रेम नहीं, व्यापार है। पर परमेश्वर का प्रेम ऐसा नहीं है। वह हमें वैसे ही अपनाता है जैसे हम हैं। जब हम यह प्रेम गहराई से महसूस करते हैं,
तो हमारे अंदर एक बदलाव आता है। हम धीरे-धीरे वैसा ही प्रेम दूसरों को देना चाहते हैं।

इनाम और सज़ा से हम केवल थोड़ी देर तक अच्छे बन सकते हैं। लेकिन असली परिवर्तन केवल प्रेम से होता है। परमेश्वर का प्रेम हमें ज़बरदस्ती नहीं बदलता —
वह हमारे अंदर की अच्छाई को बाहर लाता है।

 

जब हमें यह समझ आता है कि हम पहले से ही पूरी तरह प्रेम किए गए हैं, तो हम खुद को नई दृष्टि से देखने लगते हैं। ना कि जैसे कोई काम अधूरा है,
बल्कि जैसे कोई प्रिय संतान है, जिसे धीरे-धीरे पूर्णता की ओर बढ़ना है। यहाँ अच्छाई कोई बोझ नहीं लगती — बल्कि एक फल है उस प्रेम का, जिसे हमने पहले ही पा लिया है।

धन्यवाद!
आप इस प्रेम को जानें, उसमें जिएं, और दूसरों तक पहुँचाएँ।

Writer: Fr. John Baptist OFM Cap.

Translators: Sr. Ekta FSLG & Sr. Catherine Lakra CMC


नोट्स:

  • Rolheiser, R. (2014). Sacred fire: A vision for a deeper human and Christian maturity (p. 118). 
  • यूहन्ना 3:16 — “क्योंकि परमेश्वर ने संसार से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपने इकलौते पुत्र को दे दिया।”
  • रोमियों 5:8 — “जब हम पापी ही थे, तब मसीह ने हमारे लिए प्राण दे दिए।”

Monday, July 28, 2025

ईश्वर हमसे प्यार क्यों करते हैं ?


क्या आपने कभी सोचा है — ईश्वर हमसे इतना प्यार क्यों करते हैं ? इसका जवाब बहुत सीधा है: क्योंकि ईश्वर खुद प्यार हैं। उनकी पहचान ही प्यार है।

वो अच्छे लोगों से भी प्यार करते हैं, और गलतियाँ करने वालों से भी। जैसे एक माँ अपने बच्चों से बिना शर्त प्यार करती है, वैसे ही  ईश्वर भी हम सबसे बिना किसी शर्त के प्यार करते हैं।

लेखक रोनाल्ड रोलहाइज़र कहते हैं: 

ईश्वर हमें तब भी प्यार करते हैं जब हम अच्छे होते हैं,
और तब भी जब हम बुरे होते हैं। ईश्वर स्वर्ग में संतों से प्रेम करते हैंऔर नरक में शैतानों से भी 

उतना ही प्रेम करते हैं।स्वर्ग के संत उस प्रेम को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और उसमें जीते हैं।नरक के शैतान उस प्रेम को ठुकरा देते हैं और उसका विरोध करते हैं। लेकिन ईश्वर का प्रेम दोनों के लिए एक जैसा ही रहता है।उनका प्रेम हमेशा बना रहता है – पूरा और अनंत।

उड़ाऊ पुत्र की कहानी में छोटा बेटा जयदाद का हिसा लेकर घर छोड़कर चला जाता है, और और बड़ा बेटा दिल में आक्रोश कीभावना लिए घर में ही रहता है। लेकिन उनका पिता दोनों से बराबर प्यार करता है। वो किसी से इसलिए प्यार नहीं करता कि वो अच्छा बना या बदल गया। वो तो हर हाल में प्यार करता है — दूरी में भी, नज़दीकी में भी।

ईश्वर हमें क्यों प्रेम करते हैं ?
क्योंकि ईश्वर खुद को कभी झुठला नहीं सकते।
उनका प्रेम कोई जवाब या प्रतिक्रिया नहीं है — बल्कि वो खुद प्रेम हैं।
उनका प्रेम बिना शर्त होता है, कभी न बदलने वाला और हमेशा के लिए।

ईश्वर का प्रेम इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम अच्छे हैं या बुरे, सफल हैं या असफल।
उनका प्रेम उनके अपने स्वभाव से निकलता है। ईश्वर किसी व्यक्ति या हालात के अनुसार बदलते नहीं।
वो हमेशा हमसे प्रेम करते हैं — क्योंकि वो अपने स्वभाव के प्रति सच्चे रहते हैं।

ईश्वर हमें प्रेम करते हैं, क्योंकि वे प्रेम हैं।

हमारे लिए एक गहरा प्रश्न यह हो सकता है:

क्या हम ऐसा जीवन और व्यक्तित्व विकसित कर सकते हैं जो प्रेम में जड़ित हो —

ऐसा प्रेम जो इस पर आधारित न हो कि दूसरे कौन हैं या वे क्या करते हैं,

बल्कि इस पर आधारित हो कि ईश्वर ने हमें कैसा व्यक्ति बनने के लिए बुलाया है?



नोट्स:

  • Rolheiser, R. (2014). Sacred fire: A vision for a deeper human and Christian maturity (p. 118). 
  • कहानी: लूका 15:11–32 (उड़ाऊ पुत्र)
  • 1 योहन 4:8 – “ईश्वर प्रेम हैं”


Writer: Fr. John Baptist OFM Cap

Translator: Sr. Ekta FSLG

 

Monday, July 21, 2025

अंदरूनी अन्यायी न्यायाधीश


मानव शायद एकमात्र ऐसी प्रजाति है जो सचेत रूप से न्याय के सिद्धांत में विश्वास करती है। इसके मूल के रूप मेंन्याय निष्पक्षता,नैतिकता और वैधता का अभ्यास है जो हम दूसरों और खुद के साथ व्यवहार करते हैं l इसके लिए आवश्यक है कि परिणाम हमारे कर्म के अनुपात मेंदिए जाएँ और हम अपनी योग्यता से अधिक बोझ  उठाएँ।

फिर भीहमारे भीतर अक्सर एक शांत विरोधाभास रहता हैएक अन्यायी न्यायाधीश। हम भले ही कहें कि हम न्याय को महत्व देते हैं,लेकिन हम अक्सर न्याय की सीमा से कहीं अधिक लज्जा और दोषारोपण का अभ्यास करते हैं। एक बार की गई गलतीआजीवन कारावास बनजाती है। एक बार कीमत चुकाने के बजायहम बार-बार एक ही गलती की कीमत चुकाते हैं - मानसिकभावनात्मक और संबंधों के स्तर पर।

 फोर एग्रीमेंट्स प्रैक्टिकल गाइड टू पर्सनल फ़्रीडम मेंडॉन मिगुएल रुइज़ कहते हैं:

एक गलती की कीमत हम कितनी बार चुकाते हैंइसका उत्तर है हज़ार बार। धरती पर इंसान ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो एक हीगलती की हज़ार बार सज़ा भुगतता है... हम गलती करते हैंखुद को आंकते हैंखुद को दोषी पाते हैं और खुद को सज़ा देते हैं... हरबार जब हमें याद आता हैतो हम खुद को फिर से आंकते हैं... और अगर हमारी पत्नी या पति हैतो वह भी हमें उस गलती की याददिलाता हैताकि हम खुद को फिर से आंक सकेंखुद को सज़ा दे सकें और खुद को फिर से दोषी पा सकें। क्या यह उचित है?

 

रुइज़ आगे पूछते हैं कि हम कितनी बार दूसरों कोअपने जीवनसाथीबच्चोंमाता-पिता या दोस्तों कोएक ही गलती की बार-बारसज़ा देते हैं। हर बार जब हम उनकी गलतियों को याद करते हैंतो हम अपने दर्द को फिर से जगा देते हैं और उन्हें आक्रोश का भावनात्मक ज़हर देतेहैं। वह कहते हैं कि यह चक्र न्याय नहीं है।

सच्चा न्याय सज़ा की सीमाएँ तय करता है। किसी गलती का समाधान हो जाने के बाद यह हमें आज़ाद कर देता है। लेकिन हमारे भीतरका अन्यायी न्यायाधीश यादों पर फलता-फूलता हैन्याय को यातना के साधन में बदल देता है। संतुलन बहाल करने के बजाययह ज़ख्मों को फिरसे खोल देता है।

इस चक्र को तोड़ने के लिएहमें सबसे पहले इस आंतरिक न्यायाधीश की उपस्थिति को पहचानना होगा और करुणा से प्रतिक्रिया देनीहोगी। वास्तविक न्याय स्वयं और दूसरों के प्रति दया से शुरू होता है। इसका अंत अंतहीन दंड में नहींबल्कि शांति में होता है।

 

Writer: Fr. John Baptist OFM Cap.

Translator: Sr. Catherine Lakra CMC

 

Notes

Ruiz, D. M. (1997). The four agreements: A practical guide to personal freedom (p. 12). Amber-Allen Publishing.

परायापन के डर को शांत करना

हर इंसान के दिल में एक चाहत होती है – किसी से जुड़ने की। हमें अपना लगने की ज़रूरत होती है और यह हमारी ज़िंदगी का एक अहम् हिस्सा है। जब हमें ...