Monday, July 28, 2025

ईश्वर हमसे प्यार क्यों करते हैं ?


क्या आपने कभी सोचा है — ईश्वर हमसे इतना प्यार क्यों करते हैं ? इसका जवाब बहुत सीधा है: क्योंकि ईश्वर खुद प्यार हैं। उनकी पहचान ही प्यार है।

वो अच्छे लोगों से भी प्यार करते हैं, और गलतियाँ करने वालों से भी। जैसे एक माँ अपने बच्चों से बिना शर्त प्यार करती है, वैसे ही  ईश्वर भी हम सबसे बिना किसी शर्त के प्यार करते हैं।

लेखक रोनाल्ड रोलहाइज़र कहते हैं: 

ईश्वर हमें तब भी प्यार करते हैं जब हम अच्छे होते हैं,
और तब भी जब हम बुरे होते हैं। ईश्वर स्वर्ग में संतों से प्रेम करते हैंऔर नरक में शैतानों से भी 

उतना ही प्रेम करते हैं।स्वर्ग के संत उस प्रेम को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और उसमें जीते हैं।नरक के शैतान उस प्रेम को ठुकरा देते हैं और उसका विरोध करते हैं। लेकिन ईश्वर का प्रेम दोनों के लिए एक जैसा ही रहता है।उनका प्रेम हमेशा बना रहता है – पूरा और अनंत।

उड़ाऊ पुत्र की कहानी में छोटा बेटा जयदाद का हिसा लेकर घर छोड़कर चला जाता है, और और बड़ा बेटा दिल में आक्रोश कीभावना लिए घर में ही रहता है। लेकिन उनका पिता दोनों से बराबर प्यार करता है। वो किसी से इसलिए प्यार नहीं करता कि वो अच्छा बना या बदल गया। वो तो हर हाल में प्यार करता है — दूरी में भी, नज़दीकी में भी।

ईश्वर हमें क्यों प्रेम करते हैं ?
क्योंकि ईश्वर खुद को कभी झुठला नहीं सकते।
उनका प्रेम कोई जवाब या प्रतिक्रिया नहीं है — बल्कि वो खुद प्रेम हैं।
उनका प्रेम बिना शर्त होता है, कभी न बदलने वाला और हमेशा के लिए।

ईश्वर का प्रेम इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम अच्छे हैं या बुरे, सफल हैं या असफल।
उनका प्रेम उनके अपने स्वभाव से निकलता है। ईश्वर किसी व्यक्ति या हालात के अनुसार बदलते नहीं।
वो हमेशा हमसे प्रेम करते हैं — क्योंकि वो अपने स्वभाव के प्रति सच्चे रहते हैं।

ईश्वर हमें प्रेम करते हैं, क्योंकि वे प्रेम हैं।

हमारे लिए एक गहरा प्रश्न यह हो सकता है:

क्या हम ऐसा जीवन और व्यक्तित्व विकसित कर सकते हैं जो प्रेम में जड़ित हो —

ऐसा प्रेम जो इस पर आधारित न हो कि दूसरे कौन हैं या वे क्या करते हैं,

बल्कि इस पर आधारित हो कि ईश्वर ने हमें कैसा व्यक्ति बनने के लिए बुलाया है?



नोट्स:

  • Rolheiser, R. (2014). Sacred fire: A vision for a deeper human and Christian maturity (p. 118). 
  • कहानी: लूका 15:11–32 (उड़ाऊ पुत्र)
  • 1 योहन 4:8 – “ईश्वर प्रेम हैं”


Writer: Fr. John Baptist OFM Cap

Translator: Sr. Ekta FSLG

 

Monday, July 21, 2025

अंदरूनी अन्यायी न्यायाधीश


मानव शायद एकमात्र ऐसी प्रजाति है जो सचेत रूप से न्याय के सिद्धांत में विश्वास करती है। इसके मूल के रूप मेंन्याय निष्पक्षता,नैतिकता और वैधता का अभ्यास है जो हम दूसरों और खुद के साथ व्यवहार करते हैं l इसके लिए आवश्यक है कि परिणाम हमारे कर्म के अनुपात मेंदिए जाएँ और हम अपनी योग्यता से अधिक बोझ  उठाएँ।

फिर भीहमारे भीतर अक्सर एक शांत विरोधाभास रहता हैएक अन्यायी न्यायाधीश। हम भले ही कहें कि हम न्याय को महत्व देते हैं,लेकिन हम अक्सर न्याय की सीमा से कहीं अधिक लज्जा और दोषारोपण का अभ्यास करते हैं। एक बार की गई गलतीआजीवन कारावास बनजाती है। एक बार कीमत चुकाने के बजायहम बार-बार एक ही गलती की कीमत चुकाते हैं - मानसिकभावनात्मक और संबंधों के स्तर पर।

 फोर एग्रीमेंट्स प्रैक्टिकल गाइड टू पर्सनल फ़्रीडम मेंडॉन मिगुएल रुइज़ कहते हैं:

एक गलती की कीमत हम कितनी बार चुकाते हैंइसका उत्तर है हज़ार बार। धरती पर इंसान ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो एक हीगलती की हज़ार बार सज़ा भुगतता है... हम गलती करते हैंखुद को आंकते हैंखुद को दोषी पाते हैं और खुद को सज़ा देते हैं... हरबार जब हमें याद आता हैतो हम खुद को फिर से आंकते हैं... और अगर हमारी पत्नी या पति हैतो वह भी हमें उस गलती की याददिलाता हैताकि हम खुद को फिर से आंक सकेंखुद को सज़ा दे सकें और खुद को फिर से दोषी पा सकें। क्या यह उचित है?

 

रुइज़ आगे पूछते हैं कि हम कितनी बार दूसरों कोअपने जीवनसाथीबच्चोंमाता-पिता या दोस्तों कोएक ही गलती की बार-बारसज़ा देते हैं। हर बार जब हम उनकी गलतियों को याद करते हैंतो हम अपने दर्द को फिर से जगा देते हैं और उन्हें आक्रोश का भावनात्मक ज़हर देतेहैं। वह कहते हैं कि यह चक्र न्याय नहीं है।

सच्चा न्याय सज़ा की सीमाएँ तय करता है। किसी गलती का समाधान हो जाने के बाद यह हमें आज़ाद कर देता है। लेकिन हमारे भीतरका अन्यायी न्यायाधीश यादों पर फलता-फूलता हैन्याय को यातना के साधन में बदल देता है। संतुलन बहाल करने के बजाययह ज़ख्मों को फिरसे खोल देता है।

इस चक्र को तोड़ने के लिएहमें सबसे पहले इस आंतरिक न्यायाधीश की उपस्थिति को पहचानना होगा और करुणा से प्रतिक्रिया देनीहोगी। वास्तविक न्याय स्वयं और दूसरों के प्रति दया से शुरू होता है। इसका अंत अंतहीन दंड में नहींबल्कि शांति में होता है।

 

Writer: Fr. John Baptist OFM Cap.

Translator: Sr. Catherine Lakra CMC

 

Notes

Ruiz, D. M. (1997). The four agreements: A practical guide to personal freedom (p. 12). Amber-Allen Publishing.

Sunday, July 13, 2025

आत्मा दर्द में अर्थ खोजती है


हाय दोस्तों,
आज दिल से एक बात करनी है — दर्द के बारे में। हाँ वही दर्दजो हर किसी ने कभी  कभी महसूस किया है। चोट लगती हैजल जाते हैंकभी दिल टूटता है — तो दर्द तो होता ही है। और ये सिर्फ हमें नहीं होता — जानवरों को भी होता है। सब जीवित प्राणियों को होता है। परफर्क ये है कि हम इंसान दर्द को बस महसूस नहीं करतेहम उसके बारे में सोचते हैंसवाल करते हैं।
ये क्यों हुआ?”
मेरे साथ ही क्यों?”
इसका कोई मतलब भी है या नहीं?”

ज्ञानी पुरुष कुशनर — एक बात कहते हैं जो दिल को छू जाती  है। वो कहते हैं —
सोचो दो तरह के दर्द के बारे में:
एक — बच्चे को जन्म देने का दर्द।
दूसरा — किडनी स्टोन का दर्द।

दोनों बहुत तकलीफ देते हैंपर फर्क ये है — बच्चा पैदा होने वाला हैएक नया जीवन  रहा है,
तो एक माँ वो दर्द सह लेती है — खुशी-खुशी। क्योंकि वो जानती है कि ये दर्द किसी अच्छे चीज़ का रास्ता है। लेकिन किडनी स्टोन वालादर्दबस दर्द ही है।  कोई मतलब कोई उम्मीद।

तो कुशनर कहते हैं — दर्द वो कीमत है जो हम ज़िंदा रहने के लिए चुकाते हैं।
सोचो — जो मरे हुए हैंउन्हें कुछ महसूस नहीं होता। जब हम किसी दर्द — चाहे वह शारीरिक हो या भावनात्मक — को अर्थ देने के नज़रियासे देखते हैंतो हमारा ध्यान बदल जाता है। 

ये क्यों हो रहा है?” पूछने के बजाय
हम पूछना शुरू “करते हैं”  —
इस दर्द से मैं क्या सीख सकता हूँ?”
क्या ये दर्द मुझे और गहराई से जीना सिखा रहा है ?”

दर्द तो सबको होता है — लेकिन कोई उस दर्द में टूट जाता हैऔर कोई उसी दर्द से मजबूत बन जाता है। और ये हम पर है — कि हम उस दर्दको खाली पीड़ा बनाएंया एक ऐसा सफ़रजो हमें कुछ सिखा जाएथोड़ा और इंसान बना जाए।

तो अगली बार जब कुछ चुभेकुछ बुरा लगेया आँसू निकल आएं — थोड़ा रुकिएसाँस लीजिएऔर खुद से पूछिए:
क्या ये दर्द मुझे थोड़ा और इंसान बना सकता है?”

बस इतनी सी बात थी आज — दिल से दिल तक। अगर अच्छा लगातो किसी दोस्त से ज़रूर शेयर करना — क्योंकि सबको कभी  कभी ये सुनने की ज़रूरत होती है

Writer: Fr. John Baptist OFM Cap.

Translator: Sr. Ekta Stephen FSLG


Notes

Kushner H. S. (1981). When bad things happen to good people (pp. 72-73). Anchor Books.

 

परायापन के डर को शांत करना

हर इंसान के दिल में एक चाहत होती है – किसी से जुड़ने की। हमें अपना लगने की ज़रूरत होती है और यह हमारी ज़िंदगी का एक अहम् हिस्सा है। जब हमें ...