Monday, July 21, 2025

अंदरूनी अन्यायी न्यायाधीश


मानव शायद एकमात्र ऐसी प्रजाति है जो सचेत रूप से न्याय के सिद्धांत में विश्वास करती है। इसके मूल के रूप मेंन्याय निष्पक्षता,नैतिकता और वैधता का अभ्यास है जो हम दूसरों और खुद के साथ व्यवहार करते हैं l इसके लिए आवश्यक है कि परिणाम हमारे कर्म के अनुपात मेंदिए जाएँ और हम अपनी योग्यता से अधिक बोझ  उठाएँ।

फिर भीहमारे भीतर अक्सर एक शांत विरोधाभास रहता हैएक अन्यायी न्यायाधीश। हम भले ही कहें कि हम न्याय को महत्व देते हैं,लेकिन हम अक्सर न्याय की सीमा से कहीं अधिक लज्जा और दोषारोपण का अभ्यास करते हैं। एक बार की गई गलतीआजीवन कारावास बनजाती है। एक बार कीमत चुकाने के बजायहम बार-बार एक ही गलती की कीमत चुकाते हैं - मानसिकभावनात्मक और संबंधों के स्तर पर।

 फोर एग्रीमेंट्स प्रैक्टिकल गाइड टू पर्सनल फ़्रीडम मेंडॉन मिगुएल रुइज़ कहते हैं:

एक गलती की कीमत हम कितनी बार चुकाते हैंइसका उत्तर है हज़ार बार। धरती पर इंसान ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो एक हीगलती की हज़ार बार सज़ा भुगतता है... हम गलती करते हैंखुद को आंकते हैंखुद को दोषी पाते हैं और खुद को सज़ा देते हैं... हरबार जब हमें याद आता हैतो हम खुद को फिर से आंकते हैं... और अगर हमारी पत्नी या पति हैतो वह भी हमें उस गलती की याददिलाता हैताकि हम खुद को फिर से आंक सकेंखुद को सज़ा दे सकें और खुद को फिर से दोषी पा सकें। क्या यह उचित है?

 

रुइज़ आगे पूछते हैं कि हम कितनी बार दूसरों कोअपने जीवनसाथीबच्चोंमाता-पिता या दोस्तों कोएक ही गलती की बार-बारसज़ा देते हैं। हर बार जब हम उनकी गलतियों को याद करते हैंतो हम अपने दर्द को फिर से जगा देते हैं और उन्हें आक्रोश का भावनात्मक ज़हर देतेहैं। वह कहते हैं कि यह चक्र न्याय नहीं है।

सच्चा न्याय सज़ा की सीमाएँ तय करता है। किसी गलती का समाधान हो जाने के बाद यह हमें आज़ाद कर देता है। लेकिन हमारे भीतरका अन्यायी न्यायाधीश यादों पर फलता-फूलता हैन्याय को यातना के साधन में बदल देता है। संतुलन बहाल करने के बजाययह ज़ख्मों को फिरसे खोल देता है।

इस चक्र को तोड़ने के लिएहमें सबसे पहले इस आंतरिक न्यायाधीश की उपस्थिति को पहचानना होगा और करुणा से प्रतिक्रिया देनीहोगी। वास्तविक न्याय स्वयं और दूसरों के प्रति दया से शुरू होता है। इसका अंत अंतहीन दंड में नहींबल्कि शांति में होता है।

 

Writer: Fr. John Baptist OFM Cap.

Translator: Sr. Catherine Lakra CMC

 

Notes

Ruiz, D. M. (1997). The four agreements: A practical guide to personal freedom (p. 12). Amber-Allen Publishing.

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